Friday, April 1, 2011

holika gai.. holi gai .. par prahlad ki nahi aai kisi ko yaad!!



बड़ी पुरानी दन्त कथा के अनुसार भगवान् श्री विष्णु जी का एक परम भक्त था, प्रहलाद जिसने अपनी श्रद्धा सिद्ध करने के लिए अग्नी परीक्षा दी थी. कथा के अनुसार होलिका नाम की एक राक्षसीं थी जिसे आग से न जलने का वरदान मिला था, और उसने प्रहलाद को मारने के लिए उसे आग में लेकर बैठ गई थी पर बड़े ही चमत्कारी रूप से होलिका खुद ही जल कर भस्म हो गई और प्रहलाद को कोई नुक्सान नहीं हुआ जिसे सब सत्य की असत्य पर विजय मानते हैं. आज लोग उसी तर्ज पर होलिका दहन तो पूरे पारंपरिक तरीके से करते हैं, कहा जाए तो इसकी तयारियां महीने दो महीने पहले से ही शुरू कर देते हैं. लकड़ियाँ इक्कठा करना, जगह निर्धारित करना, चंदा जुटाना, banner  बनवाना, सजावट करना वगिरह - वगिरह. होलिका दहन के दिन लोग उसकी परिक्रमा करते हैं, प्रशाद चढाते हैं, नाचते - गाते हैं और होलिका जलाते हैं जो खास कर सबसे बुजुर्ग या सबसे बड़ा (ओहदेदार) ही करता है.
     पर एक बात जो ज्यादा तर लोग गौर नहीं करते वो है, होलिका जलने के बाद बचे "प्रहलाद" की, हर दूसरे चौराहे पर पर एक या दो प्रहलाद दिख जाते है कोई पूछता ही नहीं. क्या  यही है सत्य पर असत्य की विजय? छोटी होली से पहले लकड़ियों को चौराहों पर इक्कठा कर के ट्राफ्फिक  को न्योता देना और जल जाने के बाद भी, बचे हुए  प्रहलाद को वहा बेसहारा छोड़ देना.अगर कहीं कोई प्रहलाद हैं तो वो ये सब देख कर कहीं गोमती में  कूद आत्महत्या न कर ले बेचारे की अग्नि परीक्षा तो ऐसे बेकार गई जैसे सर्फ़ एक्सेल ने उसे "धो डाला" हो. ऐसा लगता है बेचारा प्रहलाद रोड पर पड़े पड़े सोचता होगा की गलती कर दी "होलिका के साथ जल कर तीर से उड़ा देना चाहिए था या विष्णु जी से ही शिफारिश लगा देनी थी होलिका को टपकाने लिए, सारा focus तो ये राक्षसीं ही ले गई मुझे कोई पूछता नहीं", जाने क्यों लोगों को होलिका जलाने में तो बड़ा मजा आता है पर ये ही भूल जाते हैं की होलिका जलाते क्यों हैं. लोगों से पूछो तो वो तो यही कहते हैं, जलाते आ रहे हैं, ऐसे ही होता है... अरे भाई जब लकड़ियाँ इक्कठा करी होलिका के नाम पर तो बची हुई हटा देनी थी प्रहलाद के नाम पर. पर हम क्या करें... देश मेरा रंरेज ये बाबू घाट घाट यहाँ घटता जादू ...!!!

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