Monday, April 4, 2011

talab hui poori!

मेरे पिछले लेख के बाद अगर मै ये लेख लिख पा रही हूँ तो इसका पूरा शेर्य जाता है हमारी क्रिकेट टीम को जिसने हम भारतीयों की "प्याले की तलब" को पूरा किया और इसका मरहम सचिन पाजी को लगाया. दिल की खुशियाँ छुपाए नहीं छुपती, ऐसा लगता है मानो मैच हमने ही जीता है, आखिरी छक्का धोनी ने ही नहीं बल्कि पूरे भारत ने लगाया है, अब तो पूरे "जहाँ के हम सिकंदर हैं". जीत के बात जो पठाखे जलाए गए हैं, जो खुशियाँ मनाई गई हैं.... एक मुश्त कहा जाए तो जो दिवाली मनाई गई है वो ऐसी दीवाली है जो क्यों मनाई गई है ये हम अपनी आँखों से देखने वाले बेहद खुशनसीब लोग हैं जो आने वाले कई सालों तक इस खुशी को गाएंगे. राम और राम के सेना ने लंका जीती थी या नहीं इसका कोई साक्ष्य है या नहीं पर साक्षी के धोनी और धोनी की सेना ने लंका पर विजय प्राप्त की है इसके कई साक्षी हैं. भले ही भारत पूरे विश्व पर छाया था घोटालो को ले कर पर इस जीत के बाद पूरी दुनिया ने उसके सात खून माफ़ कर दिए हैं. फिल्मस्टार्स ने इस साल विश्व स्तर पर कोई बड़ा अवार्ड नहीं जीता, नेताओं ने भी विश्व स्तर पर कोई खास डंका नहीं बजाया पर हमारी क्रिकेट टीम ने पूरी दुनिया को धो डाला है और चुटकी बजा के धुल चटा ही दिया है.

Friday, April 1, 2011

ek pyale ki talb!

एक प्याली चाय दिन बना देती है, एक प्याली काफ्फी दोस्त बना देती है. फिर चाहे वो प्याली मिटटी की हो कांच की या स्टील की सबका मन तृप्त करती है, पर मै यहाँ जिस प्याले की बात करने जा रही हूँ वो तो ऐसा "प्याला" है जिसकी दीवानी पूरी दुनिया है... और उस एक प्याले को पाने के लिए दुनिया भर के देशों ने लोहा लिया, कड़ी मेहनत की, और कई दिनों की मशकत के बाद अब, परिणाम चाहे जो हो ये "प्याला" एशिया में ही आना है. जी हाँ मै बात कर रही हूँ वर्ल्ड कप(प्याला) की.. एक प्याला पूरी दुनिया का!!  वर्ल्ड कप की शुरुआत से ही हर हिन्दुस्तानी के दिल में खलबली शुरू हो गई थी, लोग हर मैच में टकटकी लगा देखते थे, बुरा खेलने पर टीम की कमियों का बखान उतनी ही जोर शोर से होता था जितना जीत जाने पर तारीफ. और हो भी क्यों न? अरबो भारतियों के लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल ही नहीं बल्कि लोग इसे धरम की तरह मानने लग गए हैं. जहा तेंदुलकर भगवान् है और हनुमान की तरह सेना ले कर धोनी चले हैं लंकंस से लोहा लेने. ये तो हमारा दिल है जो इस एक खेल को धरम, करम, और मरहम मान बैठे हैं, और इस मरहम की सबसे ज्यादा जरुरत है सचिन पाजी को जो शतकों के शतक नहीं लगा पाए पिछले  मैच में. भारत जब सेमी final  पंहुचा तो ऐसा लगा मानो " रात भी एक नई सुबह hogai, रात भी एक नई शुरुआत होगी ". अब तो हर भारतीय का नारा है, "बम्बई चलो ये वर्ल्ड कप हमारा है" . हर कोई ऐसा महसूस कर रहा है जैसे शेर के मुह में खून लग गया है और अब इस "प्याले" की ललक-लालसा-तलब दूर होनी ही चाहिए...... दे घुमा के !!!

holika gai.. holi gai .. par prahlad ki nahi aai kisi ko yaad!!



बड़ी पुरानी दन्त कथा के अनुसार भगवान् श्री विष्णु जी का एक परम भक्त था, प्रहलाद जिसने अपनी श्रद्धा सिद्ध करने के लिए अग्नी परीक्षा दी थी. कथा के अनुसार होलिका नाम की एक राक्षसीं थी जिसे आग से न जलने का वरदान मिला था, और उसने प्रहलाद को मारने के लिए उसे आग में लेकर बैठ गई थी पर बड़े ही चमत्कारी रूप से होलिका खुद ही जल कर भस्म हो गई और प्रहलाद को कोई नुक्सान नहीं हुआ जिसे सब सत्य की असत्य पर विजय मानते हैं. आज लोग उसी तर्ज पर होलिका दहन तो पूरे पारंपरिक तरीके से करते हैं, कहा जाए तो इसकी तयारियां महीने दो महीने पहले से ही शुरू कर देते हैं. लकड़ियाँ इक्कठा करना, जगह निर्धारित करना, चंदा जुटाना, banner  बनवाना, सजावट करना वगिरह - वगिरह. होलिका दहन के दिन लोग उसकी परिक्रमा करते हैं, प्रशाद चढाते हैं, नाचते - गाते हैं और होलिका जलाते हैं जो खास कर सबसे बुजुर्ग या सबसे बड़ा (ओहदेदार) ही करता है.
     पर एक बात जो ज्यादा तर लोग गौर नहीं करते वो है, होलिका जलने के बाद बचे "प्रहलाद" की, हर दूसरे चौराहे पर पर एक या दो प्रहलाद दिख जाते है कोई पूछता ही नहीं. क्या  यही है सत्य पर असत्य की विजय? छोटी होली से पहले लकड़ियों को चौराहों पर इक्कठा कर के ट्राफ्फिक  को न्योता देना और जल जाने के बाद भी, बचे हुए  प्रहलाद को वहा बेसहारा छोड़ देना.अगर कहीं कोई प्रहलाद हैं तो वो ये सब देख कर कहीं गोमती में  कूद आत्महत्या न कर ले बेचारे की अग्नि परीक्षा तो ऐसे बेकार गई जैसे सर्फ़ एक्सेल ने उसे "धो डाला" हो. ऐसा लगता है बेचारा प्रहलाद रोड पर पड़े पड़े सोचता होगा की गलती कर दी "होलिका के साथ जल कर तीर से उड़ा देना चाहिए था या विष्णु जी से ही शिफारिश लगा देनी थी होलिका को टपकाने लिए, सारा focus तो ये राक्षसीं ही ले गई मुझे कोई पूछता नहीं", जाने क्यों लोगों को होलिका जलाने में तो बड़ा मजा आता है पर ये ही भूल जाते हैं की होलिका जलाते क्यों हैं. लोगों से पूछो तो वो तो यही कहते हैं, जलाते आ रहे हैं, ऐसे ही होता है... अरे भाई जब लकड़ियाँ इक्कठा करी होलिका के नाम पर तो बची हुई हटा देनी थी प्रहलाद के नाम पर. पर हम क्या करें... देश मेरा रंरेज ये बाबू घाट घाट यहाँ घटता जादू ...!!!