एक दिन मुकुल सर ने क्लास में पढ़ाते - पढ़ाते बोला कि " ज़िन्दगी कि किताब का कोई सल्लेबस नहीं है " . ये तो मुकुल सर का स्टाइल है कि क्लास में सल्लेबस कि पढाई के साथ साथ जिंदगी बेहतर जीने के टिप्स भी देते रहते हैं, मेरे ख्याल से यही कारण है कि सर कि क्लास में ज्यादा भीड़ रहती है.
खैर मै बैठी थी सर कि इस बात गहराई जानने के लिए. सही ही तो कहा सर ने .. "ज़िन्दगी कि किताब का कोई सल्लेबस नहीं ". देखा जाए तो पढने के लिए हर बुक का कंटेंट होता है, मागज़ीन और नोवेल का भी एक पर्टिकुलर जेनेरे होता है,हाथो कि लकीरों को पढने का भी एक तरीका होता है,चेहरा पढने का भी एक एंगेल होता है. लेकिन ज़िन्दगी कि किताब में कुछ भी निर्धारित नही, कोई सल्लेबस नहीं फिर भी हम जीते है. कोई अपनी शर्तों पे जीता है कोई समाज कि , कोई परिवार कि तो कोई परिस्थितिओं कि . ये किसी को पता नहीं होता कि अगले पल क्या होना है, और अगर पता भी हो तो ये पता नहीं होता कि कैसे होना है.. विसे तो लोगों ने ज़िन्दगी को कई दिशाएँ दी हैं, किसी के लिए ज़िन्दगी गुलाब कि तरह है जिसमे सुगंध और सुन्दरता के साथ साथ कांटे भी हैं, किसी के लिए ज़िन्दगी पहेली है तो किसी के लिए ज़िन्दगी के स्टेज प्ले है वगिरह-वगैरह . पर मेरा मानना है कि अगर दुनिया में करोडो जीवो में किसी को इंसान का जीवन मिला है तो कोई न कोई बड़ा कारण जरुर होता है. हर किसी में इतनी ताकत है कि वो कुछ हट के कर दिखाए. और अगर कोई ये कहे कि औरत या स्त्री में इतनी ताकत नहीं कि वो कुछ हट के कर सके या समाज कि बेड़ियाँ तोड़ सके तो उससे बड़ा कोई बेवकूफ नहीं. हमने एक रिक्शा चलाने वाली को देखा है नाव चलाने वाली को देखा है, ट्रेन चलाने वाली को देखा है, हवाई जहाज चलाने वाली को देखा है, स्पेस क्राफ्ट चलाने वाली को देखा है, संसद चलाने वाली को देखा है, देश चलाने वाली को देखा है , और एक घर चलाने वाली को भी देखा है. अब इसमें कोई शक नहीं है कि चाहे वो लड़की हो या लड़का दोनों में इतनी ताकत है कि ज़माने को कुछ खास कर दिखाए.
पर यहाँ भी अगर देखा जाए तो जिंदगी चलाने वाली ... तो कोई हो ही नहीं सकती. क्योंकि जिंदगी हमे चलती है और शायद इसी वजह से इसका कोई सल्लेबस नहीं !!
मनीषा बात आप ठीक से समेट नहीं पाई थोडा और विस्तार देना था पर स्फुट लेखन के हिसाब से बढ़िया पोस्ट
ReplyDeleteGOOD YAAR.
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