नत्था दास मानिक पूरी, एक नाम जिसे ऐसी पहचान मिल गई है जो कोई भूल नहीं सकता भारतीय सिनेमा में शिरकत करने वालों में एक निचली जाती का पात्र; कहा जाता है जैसे इंडियन क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाने के लिए खास काबिलियत होनी चाहए ठीक उसी तरह सिनेमा में अपनी पहचान बनाने के लिए, एक किरदार को लोहों के ज़ेहन में बसाने के लिए लिए भी काबिलियत की जरुरत होती है.
देखा जाए तो भारतीय सिनेमा में दलित को केन्द्रित करती हुई पहली फिल्म सन 1959 में आई 'सुजाता' एक अछूत लड़की की पहचान तलाशने की कहानी. फिर आई और फिल्म जो मील का पत्थर साबित हुई, वो थी 'अछूत कन्या' जिसमे देविका रानी की दुमदार भूमिका ने लोगों के दिलो दिमाग पर प्रभाव डाला. फिर 'सौतन' में पद्मिनी कोह्लापुरे में एक निचली जाती की लड़की की भूमिका निभाई. गौर किया जाए तो उस दौर में निचली जाती के लोगों के मार्मिक भाव जयादातर स्त्रियों पर केन्द्रित कर बनाया जाता था. पर अब समाज में बदलाव आने के साथ साथ सिनेमा में भी काफी बदलाव आए हैं. अब दलितों की पीडाएं महिलाऐं ही नहीं बल्कि पुरुष भी दर्शाने लग गए हैं. ऐसे कई उधाहरण है ... अजय देवगन 'राजनीति' में, विवेक ओबेरॉय 'रक्त चरित्र' में, अजय देगन 'आक्रोश ' में, वगिरह वगैरह . इन सब फिल्मों में लीड भूमिका एक निचली जाती के पुरुष और उसकी पहचान या इन्साफ की लड़ाई की कहानी है.
इन सब बदलावों से लगता है हमारे समाज का रूप भी बदल रहा है, जैसे अमीर-गरीब , ठाकुर- मजदुर, जाती - प्यार, के बंधन अब नष्ट हो रहे हैं . सही ही कहा जाता है की सिनेमा इस समाज का आइना है, सिनेमा वो दिखाता है जो घट रहा है बदलाव की ये बयार हमारे समाज को एक जुट और मजबूत बना रहा है.

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