कुर्सीया हर किसी के जीवन में बड़ा महत्व रखती हैं. शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसे अपने स्कूल का पहला दिन याद न हो जहाँ उसे एक कुर्सी पर बैठा दिया गया था, वो पहली कुर्सी हर किसी के ज़हन में घर कर जाती है. बचपन की वो याद, जब दादा जी की आराम कुर्सी पर बैठ कर उनके हुक्के से हुड - हुडाना, उनकी ही छड़ी से उनको चिढाना, स्कूल में teacher के न रहने पर उनकी कुर्सी पर बैठ कर उनकी नक़ल उतारना, दोस्तों की बेंच(कुर्सी) पर आधा खाया हुआ समोसा रखना और किसी के बैठ जाने पर ठहाके मारना, वो सफ़र करते समय खिड़की के पास वाली सीट(कुर्सी) लेने की होड़, interview के दिन कुर्सी पर बैठ कर हिम्मत जुटा कर सामने वाली कुर्सी का जवाब देना, और नौकरी लग जाने के बाद बॉस के न रहने पर उनकी कुर्सी को जी भर के गरियाना, वगैरह -वगैरह न जाने कितनी ही यादें हैं जो हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं.
फिल्मों की बात की जाए तो एक सीन जिसमे उलटी घूमी हुई कुर्सी पर बैठे आदमी की पहचान का सुस्पेंस, एक अहम् हिस्सा है. व्हील चेअर पर बैठी गुरु फिल्म की विद्या बालन एक अहम् भूमिका निभाते हुए है एक सीख भी दे जाती हैं, कुर्सी की बनावट से हर कोई ये गेस कर जाता था की ये विल्लेन की कुर्सी है, कौन भूल सकता है मोगाम्बो की वो कुर्सी जिसपर शेर का मुह बना था, उसकी लाल चमकती आँखें बुरे को symbolise करती थी और अम्बरीश पूरी की भूमिका में चार चाँद लगाती थी. वो विल्लेन का हेरोइन को या हीरो की माँ- बहन को कुर्सी से बाँध कर कैद करना, हीरो का आकर छुड़ाना और वो हेरोइन की "आह" , एक महत्वपूर्ण पल हुआ करता था, सोचिए जरा, रजनीकांत के हाथो में कुर्सी आती होगी तो क्या होता होगा? ये कहना अतिशयोक्ति न होगा की कुर्सी के बिना फिल्मी दुनिया अधूरी है.
कुर्सी का किस्सा, अभिनेता के साथ साथ राजनेताओं के लिय भी महत्वपूरण है, सत्ता की लालच कह लो या कुर्सी का लोभ बात एक ही है. "इस" कुर्सी का आकर्षण तो अभिनेताओं- अभिनेत्रिओं को भी राजनेति में खीच लेता है . राजनेति में कुर्सी की खीचतान से कोई अनजान नहीं है, फिर वो मायावती का लालजी टंडन को "लालची टंडन" कहना हुआ या मुलायम का महिला आरक्षण बिल पर"सीटी बजा.." की बात आडवानी का मनमोहन को "कमजोर" कहना या चिताम्बरम साहब का अडवाणी जी को "फसा हुआ gramophone" कहना सब कही न कही कुर्सी की खीचतान का नतीजा है.
खैर ये तो रही एक आम इंसान से लेकर अभी नेता तक और अभिनेता से राजनेता तक कुर्सी की महत्वता, पर वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय की पत्रकारिकता एवं जन संचार विभाग की क्लास में पड़ी चार कुरसियाँ अभी तक इंतज़ार में आस लगे बैठी हैं की कोई आकर बैठे तो सही, पर यहाँ तो कई आते हैं और चले जाते हैं पर .. बैठते नहीं. मुकुल सर भले ही इन्हें यहाँ से वहा कर दे और पढ़ाते समय चलने का रास्ता बना ले पर, बैठते नहीं. जाने कब इन "कुर्सिओं का लम्बा इंतज़ार" खत्म होगा और कब इन कुर्सिओं की कहानी बनेगी.

हा हा बढ़िया लिखा है एंगल बढ़िया है बधाई
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