नाम गुम जायेगा ....चेहरा ये बदल जायेगा...... मेरी आवाज़ ही पहचान है... एक यादगार गाना है .जो आवाज़ की एहमियत को दर्शाता है, लता जी की उस मधुर आवाज़ से कोई अनजान नहीं .
सोचा जाये तो आवाज़ के बिना हमारी दुनिया अधूरी है, सोचिये ! अपने टी.वी.ऑन किया और सब दिखने के बावजूद आवाज़ न आये तो ? आप कोई ज़रूरी फोन कर रहे हो और उन तक आपकी या आप तक उनकी आवाज़ न पहुंचे? गाड़ी चलते समय अचानक से एक बूढ़े व्यक्ति के सामने आ जाने पर होर्न बजाने से आवाज़ न आये ? आप कही मुसीबत में फंसे हो और मदद के लिए चीखे पर ............आवाज़ न निकले .
बाकी आवाज़ों का तो पता नहीं लेकिन गाने सुनना हर किसी की पसंद होती है . कई बार संगीत तनाव कम करने के साथ -साथ स्फूर्ति भी लाता है . घर में शादी पड़ी हो तो क्या कहने . सभी को अपनी शादी में लाउड म्युज़िक और हेवी बैंड बाजा पसंद है . डी.जे . के बगैर तो अब शादी ऐसी है जैसे बिना रस के रसमलाई . गानों की आवाज़ के बाद अगर कोई और आवाज़ हमें बेहद पसंद है, वो है क्रिकेट कमेंट्री ; और वर्ल्ड कप का माहौल भी है, तो क्रिकेट कमेंट्री सुनते समय छक्के - चौके और आउट होने पर चिल्लाये बगैर नहीं रह पाते . ठीक वैसे ही जैसे लड़कियाँ गोलगप्पे देखने के बाद खाए बगैर नहीं रह पाती. इन सबके बीच बोर्ड परीक्षा के बच्चे ऐसे है जो बस अपने दिमाग की "आवाज़" को मजबूत करना चाहते है .जिससे की वे exam में दिमाग की आवाज़ को सुनकर अच्छे नंबर ला सके.
पर एक बात गौर करने लायक है कि " अति का भला न बोलना अति कि भली न चुप अति का भला न बरसना अति कि भली न धुप" कोई भी आवाज एक सीमा और एक अवधि तक ही अच्छी लगती है पर उसके आगे नहीं . traffic जाम में फसे होने पर बेवजह होर्न देकर बाकी लोगों को परेशान करना , शादी में देर रात तक गानों के शोर से बच्चों को पढाई से भटकाना, क्रिकेट कमेंट्री के समय शोर मचाने की वजह से घर के बाकी सदस्यों को सिरदर्द देना, ये परेशानियाँ "ध्वनी प्रदूषण " कहलाती हैं. पर ना हम अपनी आदतों से बाज आ सकते हैं ना ही ध्वनी प्रदूषण को रोकने के लिए कुछ करना पसंद करते हैं. बस ... आवाज़ देते रहो !!










